जननायक कर्पूरी ठाकुर

भारतीय समाजवाद के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर का जन्म समस्तीपुर जिले के पितौझिया गाँव (अब कर्पूरी ग्राम) में एक साधारण परिवार में 24 जनवरी, 1924 ई. को हुआ था। वे वर्ष 1934 में काँग्रेस सोषलिस्ट पार्टी से जुडे़। कर्पूरी जी ने स्नातक कक्षा में अध्ययन षुरू ही किया था कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शीर्षस्थ नेता महात्मा गाँधी के आहवान पर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में देषभक्ति की भावना से प्रेरित होकर पूरे दम-खम के साथ कूद पड़े। कुछ समय तक अपने गाँव के विद्यालय में उन्होंने षिक्षक के रूप में भी सेवा अर्पित की। इस प्रकार कहा जा सकता है कि उनका राजनीतिक जीवन 1942 से आरम्भ हुआ। इसके बाद वे सक्रिय राजनीति की मुख्यधारा से जुड़ गए ओर जीवन पर्यन्त समाजवाद के सिद्धांत को अमल में लाने हेतु सतत् संघर्षरत रहे। विभिन्न जन आन्दोलनों में अहम भागीदारी निभाते रहे जिससे नेतृत्व क्षमता धारदार और असरदार होती गयी। संसदीय लोकतंत्र में उनकी असंदिग्ध आस्था थी। 1952 से ही लगातार। विधान सभा के लिए निर्वाचित होते रहे जो उनकी लोकप्रियता का परिचायक है। वे दिसम्बर 1970 से अप्रैल 1971 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे। फिर दिसम्बर 1977 से अप्रैल 1979 तक मुख्यमंत्री बने, 1977 में लोकसभा के लिए भी निर्वाचित हुए और एक प्रखर सांसद के रूप मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनका सम्पूर्ण राजनीतिक जीवन अभाव में गुजरा और अपने परिवार के लोगों को भी अभाव में जीने के लिए प्रेरित करते रहे। ऐसा अनुपम आचरण तो किसी महामानव से ही संभव है। उनकी मान्यता थी कि मानव जीवन की सार्थकता दूसरों की भलाई में है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जननायक कर्पूरी ठाकुर को धन संचय के प्रति कोई आकषर्ण नहीं था। अपने 36 वर्षों के राजनीतिक जीवन में कोई धन-संपत्ति अर्जित नहीं की, कोई जमीन-जायदाद नहीं खरीदी, कोई धन बैंक में जमा नहीं कराया। उन्होंने ईमानदारी एवं सद्आचरण को अपनी जान से भी महत्वपूर्ण स्थान दिया। 8 फरवरी 1988 ई. को वे सदा के लिए जुदा हो गए।

यद्यपि आज वे हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके आदर्ष अमर हैं। उन्होंने जनसेवा की बदौलत ही राजनीति में अपनी मजबूत जमीन तैयार की थी। सड़क से संसद तक उन्होंने गरीबों की आवाज बुलंद की। यदि कहीं से कमजोर तबके पर जुल्म ढ़ाने की सूचना मिलती थी तो वे तीखा विरोध करते थे। गरीबों की अनवरत सेवा ने उन्हें जननायक बना दिया।


युग पुरूष सत्यनारायण सिंह

समस्तीपुर के शम्भूपट्टी गाँव में एक विलक्षण प्रतिभा का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया सत्यनारायण। उन्होंने भारत माता को अंग्रेजों की दासता से उन्मुक्त करने हेतु 1932 में अपने स्नातक की पढ़ाई को तिलांजलि दे डाली और कूद पड़े महात्मा गाँधी के आह्वान पर सत्याग्रह आन्दोलन में फिर वे जेल में ठुँस दिय गये। जेल में उनकी निष्ठा और निखर उठी। जेल से छुटने के बाद कांग्रेस संगठन में सक्रिय हो गये। इनकी लगन, कर्मठता एवं वाकपटुता से सारे नेता अचंभित थे। वे तत्कालीन दरभंगा जिला के अध्यक्ष, प्रदेष महामंत्री, काँग्रेस लेजिस्लेटिव कौंसिल के प्रधान सचेतक बने। नेहरू जी जब समस्तीपुर आये थे तो वे इनके निवास पर ही विश्राम किये।

आजादी के बाद 1952 ई0 से 1962 ई0 तक वे समस्तीपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित रहे, 1967 ई0 में दरभंगा संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। उन्होंने केन्द्र की राजनीति में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके सहयोग से समस्तीपुर में रेलवे का कायाकल्प भी संभव हुआ। उन्होंने मध्य प्रदेष के राज्यपाल के गरिमामयी पद को सुषोभित किया। समस्तीपुर जिलावासियों को उन पर नाज है।


बलिराम भगत

समस्तीपुर जिला के जलालपुर गाँव के बलिराम भगत का जन्म 07 अक्टूबर, 1922 को हुआ । पटना कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद भगत ने पटना विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की । भगत में बचपन से ही देश प्रेम की भावना इतनी प्रबल रही कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भाग लिया । भगत ने वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया । इस दौरान वे करीब 2 वर्षों तक भूमिगत रहे और आंदोलन में अपने दायित्वों को अंजाम दिया । स्वतंत्रता के बाद भगत वर्ष 1950 में अस्थायी संसद के सदस्य चुने गए । इसके बाद वे पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी तथा पांचवी लोकसभा के लगातार सदस्य बने । भगत सातवीं तथा आठवीं लोकसभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए । इतने लम्बे सार्वजनिक तथा राजनीतिक जीवन में भगत ने भारत सरकार में अनेक मंत्रालयों का कार्यभार संभाला ।
वर्ष 1952 से 1956 तक भगत वित्त मंत्रालय में ससंदीय सचिव रहे और वर्ष 1956 में इसी मंत्रालय के उप मंत्री बनाए गए । वर्ष 1963 से 1967 तक भगत योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री और कुछ समय तक रक्षा एवं विदेश मंत्रालय में सेवाएं दीं । भगत को वर्ष 1969 में इस्पात एवं भारी उद्योग मंत्रालय का कैबिनेट मंत्री बनाया गया । इसके अलावा भगत वर्ष 1985 से 1986 तक विदेश मंत्री भी रहे । भगत को 05 जनवरी 1976 को पांचवी लोकसभा का सभापति चुना गया । वर्ष 1993 में इन्हें थोड़े समय के लिए हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल और 30 जून 1993 से 01 मई 1998 तक राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया । राजस्थान के राज्यपाल के रूप में भगत ने अपनी सरलता, सादगी, आदर्श व्यवहार तथा सद्भाव की अमिट छाप छोड़ी ।


चन्द्रप्रकाश जी

भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 12 अगस्त, 1942 को समस्तीपुर स्थित अनुमंडल कार्यालय पर प्रथम बार तिरंगा लहराने वाले स्कूली छात्र चन्द्रप्रकाश जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित कर उन्हें याद करना और उनके साहसिक कारनामों की जानकारी से जिलावासियों को अवगत कराना समीचीन प्रतीत होता है।
11 अगस्त, 1942 की संध्या रेडियो पर समाचार प्रसारित हुआ कि पटना में तिरंगा फहराने के प्रयास में छात्रों पर गोलियाँ चलायी गयी और आन्दोलनकारी शहीद हुए। देशप्रेम ओर जोश से लबरेज इनका मन अंगड़ाईयाँ लेने लगा। उस समय ये के0 ई0 एच0 ई0 स्कूल (वर्तमान आर0 एस0 बी0 इन्टर विद्यालय) की आठवीं कक्षा के छात्र थे। अगले दिन सुबह अपने विद्यालय और तिरहुत एकेडमी के छात्रों के एक बड़े जत्थे के साथ चौक पर एकत्रित हुए। अंग्रेज सिपाहियों द्वारा गिरफ्तार कर अनुमंडल कार्यालय प्रांगण में लाकर जेल भेजने की तैयारी की जाने लगी। छात्र संख्या अधिक होने के कारण रस्सा में घेर कर ही रखा गया था। उस समय इनके मन-मस्तिष्क मंे कार्यालय के शीर्ष पर फहरा रहे यूनियन जैक का झंडा शूल की तरह चुभ रहा था।
उस भीड़ में से घुटनों-केहुनियों के बल सिपाहियों से नजर बचाते हुए उस घेरा से बाहर आ गये और जिलाधिकारी के वर्तमान आवासीय कार्यालय से मुख्य सड़क पर आकर अपनी उत्कट आकांक्षा को अंजाम देने की सोचने लगे। तभी पाया कि वर्तमान समाहरणालय से उत्तर कुछ-कुछ दूरी पर दो विशाल पेड़ ऐसे हैं जिनकी मोटी डालियों की मदद से अनुमंडल कार्यालय पर जाया जा सकता है।
अपना तिरंगा कमीज के अंदर लपेट उन्हीं पेड़ों की आड़ में चींटी की तरह रेंगते हुए डालियों की मदद से कार्यालय के गुम्बज तक पहुँचने में कामयाब हो गये। वहीं सावधानीपूर्वक बैठकर यूनियन जैक के झण्डा को डोरियों के सहारे आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतारा और उसी डोरी से तिरंगा बाँधकर शीर्ष तक पहुँचाया और लहरा कर वन्दे मातरम् का सिंहनाद किया। फिर तो जो होना था, वही हुआ। एकबारगी तैनात सिपाहियों की बन्दूकें इनकी ओर तन गईं, किन्तु अनुमण्डलाधिकारी की भावुकता ने उन्हें रोक दी और प्रस्ताव दिया कि गलती मान लेने पर माफ किया जा सकता है। इनकार करने पर इन्हें जेल भेज दिया गया। इस घटना से नाराज होकर अंग्रेज अधिकारियों ने इनके परिवार को बिहार से निकाल कर उत्तरप्रदेश के चौरीचौरा नामक स्थान में छोड़ दिया, जहाँ से भटकते हुए बनारस में एक छोटा मकान किराया पर लेकर रहने लगे।


महान शब्द शिल्पी कविवर अरूण

बूढ़ी गंडक नदी के किनारे अवस्थित समस्तीपुर नगर के मुख्य मार्ग पर पेठिया गाछी में ‘कवि निवास’ आज भी समस्तीपुर के गौरव गाथा का बखान करने में सक्षम है। एक समय देश एवं प्रदेश के सभी महान् कवियों का साहित्यिक संगम स्थल रह चुका यह कवि निवास आज भी साहित्यकारों के लिए किसी पुस्तकालय, वाचनालय, मंदिर से कम नहीं है। इसी भवन में 24 नवम्बर, 1923 को महान कवि पोद्दार रामावतार अरूण का जन्म हुआ था। इन्होंने स्थानीय विद्यालय से प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और लग गये साहित्यिक साधना में। परिवार का माहौल पूर्ण व्यापारिक था, किन्तु इनकी साहित्य के प्रति समर्पण को देखते हुए भाईयों ने प्रोत्साहित किया। इनकी पहली कृति ‘अरूणिमा’ सन् 1941 में प्रकाशित हुई, उसके बाद शकुन्तला, विद्यापति, सूरश्याम, विश्वमानव, कोशा, विदेह, कालिदास, आम्रपाली, अशोक पुत्र, गान्ध्या, घनघोरलाल, अगीता, संगीता, वाणाम्बरी, महाभारती, अरूण रामायण, क्रान्ति हंस (कबीर), कृष्णाम्बरी, कालदर्पण, स्वर्ग श्रृंगार और राष्ट्र शत्रु, राष्ट्र सन्यासी आदि प्रमुख काव्य कृतियाँ एवं कालिदास की आत्मकथा, भगवान बुद्ध की आत्मकथा, गुरू गोविन्द सिंह की आत्मकथा तथा अरूणायन आदि कथा साहित्य में अधिक लोकप्रिय प्रकाशन रहा। इन्होंने कुल 43 ग्रन्थों का सृजन किया, जिसमें अधिकांश हिन्दी-भाषी राज्य शासनों से पुरस्कृत-सम्मानित हुआ। राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ0 राधाकृष्णन ने कविवर अरूण को 1966 ई0 में ‘पद्म श्री’ की उपाधि से विभूषित किया। भारत सरकार ने इन्हें फिल्म पुरस्कार समिति का राष्ट्रीय सदस्य मनोनीत किया, जबकि बिहार के राज्यपाल ने विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया।


मस्ती एवं उमंग के कवि: आरसी

महान चिंतक व कवि आरसी प्रसाद सिंह का जन्म 19 अगस्त 1911 ई0 को समस्तीपुर जिला के एरौत (रोसड़ा) इनके पिता का नाम दामोदर नारायण सिंह व माता का नाम गुलाब देवी था। महाकवि आरसी का व्यक्तित्व बचपन से ही काफी आकर्षक था। उन्होंने हिन्दी और मैथिली में कई अमूल्य कतियों का सृजन किया। इसलिए आधुनिक हिन्दी-मैथिली काव्य-साहित्य में कविवर आरसी प्र0 सिंह का महत्वपूर्ण स्थान।
आरसी या आर0 सी0 नाम को लेकर भी कई चर्चाएँ होती है, किन्तु शहीद कुलदीप बलदेव नारायण मध्य विद्यालय रोसड़ा के अभिलेख में दर्ज नाम आरसी प्रसाद सिंह ही है। वे मूलतः रूप, यौवन और प्रेम के कवि हैं। श्रृंगार, वीर और शान्त उनके प्रिय रस हैं। हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में उनकी ‘रचना जीवन का झरना’ बिहार के कोने-कोने में चर्चित रहा है।
हिन्दी में मैथिली में इनकी अनेक पुस्तकें हैं। आजकल, कालजयी, आरसी पंच पल्लव, मारी के दीप, संजीवनी, कागज की नाव, पूजा के फूल, सूर्यमुखी, वीर कुँवर सिंह इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें हैं। सूर्यमुखी काव्य-संग्रह पर 1984 का साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1982 का मैथिली अकादमी का विद्यापति पुरस्कार भी इन्हें प्राप्त हुआ।


संस्कृत साहित्य के तुलसी: मदनकान्त झा ‘मैथिल’

संस्कृत साहित्य के निष्णात विद्वान पण्डित मदनकान्त झा ‘मैथिल’ मूलतः दरभंगा जिलान्तर्गत तरौणी के निवासी थे, किन्तु बाल्यकाल से ही समस्तीपुर जिले के उजियारपुर प्रखण्ड के कमला ग्राम को अपना कर्मस्थली बनाया। बचपन में ही पिता का स्नेह एवं माता का आँचल छीन जाने से कमला निवासी उनके मातामह पण्डित चक्रधर झा ने इस अनाथ बालक का पालन-पोषण किया, उसका चित्रण उन्होंने अपनी आत्मकथा में कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए किया-

"स्मरामि मातामह पादपद्म
मातामहीं चापि न विस्मरामि।
ययोः कृपापादम मृत्युपाषान्
मां बाल्यवेलासु नवास्वनाथम्।।"

चौपाल के मुखिया जी: गौरीकांत चौधरी कान्त

विलक्षण प्रतिभा और अद्भुत कर्मषीलता के प्रतीक गौरीकान्त चौधरी कान्त आकाषवाणी पटना केन्द्र के मुखिया जी के रूप में पूरे बिहार में विख्यात थे। चौपाले के मुखिया जी की गंभीर वाणी को सुनने के लिए श्रोता इस कार्यक्रम के पूर्व ही अपने-अपने दरवाजे और आँगन में रेडियो खोलकर बैठ जाते। जिले के इस सपूत का जन्म मुजौना गाँव में हुआ था। अति सामान्य किसान परिवार से आने वाले निरक्षर स्व0 कपिलेष्वर चौधरी के पुत्र ‘मुखिया जी’ का अक्षरारांभ गाँव में हुआ । उच्च षिक्षा समस्तीपुर कॉलेज समस्तीपुर एवं बिहार विष्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से प्राप्त किया । आकाषवाणी पटना में 1964 से 1993 तक चौपाल कार्यक्रम के मुखिया जी के पद को अलंकृत किया । दिनांक 22.04.1999 से मृृत्यु पर्यन्त तक मैथिली अकादमी, बिहार के पद पर रहे। गौरीकान्त चौधरी कान्त मैथिली के अन्यतम साहित्यकार थे। इनकी रचनाओं में विष्वामित्र, सीता, वंषी केवटेरै, पानकपात, ताइचुन बोल उठा, गुलबिया, चानन आदि प्रमुख है। विष्वामित्र एकांकी जब आकषवाणी से प्रसारित होता तो विष्वामित्र की भूमिका में स्वयं चौधरी जी हुआ करते थे। ओजस्वी वाणी के स्वामी एवं साहित्यानुरागी गौरीकान्त चौधरी कान्त 29 दिसम्बर, 2001 को काल कवलित हो गये ।

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